वाशिंगटन डीसी में इजरायली दूतावास के कर्मचारियों पर हमला
22 मई, 2025 को वाशिंगटन डीसी में इजरायली दूतावास के दो कर्मचारियों पर एक सशस्त्र हमला हुआ, जिसमें उनकी मृत्यु हो गई। यह घटना एक यहूदी संग्रहालय के पास हुई, और हमलावर, जिसे एक मुस्लिम शरणार्थी बताया गया, ने गिरफ्तारी के दौरान “फ्री, फ्री फिलिस्तीन” के नारे लगाए। इस हमले ने अमेरिका में राजनयिक सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा कर दी हैं, विशेष रूप से गाजा में इजरायल और हमास के बीच चल रहे संघर्ष के संदर्भ में। अमेरिकी गृह सुरक्षा मंत्री क्रिस्टी नोएम ने इसे “लक्षित हत्या” करार दिया, और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा” बताते हुए कड़े कदमों की घोषणा की। FBI की जॉइंट टेररिज्म टास्कफोर्स इस मामले की जाँच कर रही है, जिसमें हमलावर के मध्य पूर्वी संघर्षों से संभावित संबंधों की पड़ताल की जा रही है। यह घटना अमेरिका में बढ़ती राजनीतिक हिंसा का हिस्सा मानी जा रही है, जो गाजा संघर्ष के वैश्विक प्रभाव को दर्शाती है। सोशल मीडिया पर कुछ उपयोगकर्ताओं ने अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए, जबकि अन्य ने इसे एकल घटना माना। इस हमले ने शरणार्थी नीतियों और आतंकवाद विरोधी उपायों पर बहस को और तेज कर दिया है, जिसका असर 2026 के मध्यावधि चुनावों पर पड़ सकता है।

ट्रम्प प्रशासन की आप्रवासन नीतियाँ और डिपोर्टेशन विवाद
ट्रम्प प्रशासन की आप्रवासन नीतियाँ और डिपोर्टेशन विवाद 2025 में अमेरिका की राजनीति में एक प्रमुख मुद्दा बन गए हैं। हाल ही में एक संघीय जज ने फैसला सुनाया कि ट्रम्प प्रशासन ने डिपोर्टेशन से संबंधित एक अदालती आदेश का उल्लंघन किया, विशेष रूप से दक्षिण सूडान और लीबिया जैसे देशों के प्रवासियों के मामले में। एक उल्लेखनीय मामले में, वेनेजुएला के प्रवासी डैनियल जकारियास माटोस के डिपोर्टेशन ने ट्रम्प के एलियन एनेमीज़ एक्ट के उपयोग पर कानूनी सवाल खड़े किए। इन नीतियों का उद्देश्य अवैध आप्रवासन को रोकना और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना है, लेकिन डेमोक्रेट्स और मानवाधिकार संगठनों ने इन्हें मानवाधिकारों का उल्लंघन करार दिया। कैलिफोर्निया में एक जज ने डिपोर्टेशन नीतियों से प्रभावित सरकारी कर्मचारियों को फिर से नियुक्त करने का आदेश दिया, जिसने विवाद को और बढ़ाया। सोशल मीडिया पर कुछ लोग इन नीतियों को “आवश्यक” मानते हैं, जबकि अन्य इन्हें “क्रूर” बताते हैं। यह मुद्दा 2026 के मध्यावधि चुनावों में मतदाताओं के बीच ध्रुवीकरण को बढ़ा सकता है, क्योंकि यह अमेरिका की आप्रवासन प्रणाली और सामाजिक न्याय के सवालों को उजागर करता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) में बड़े बदलाव
ट्रम्प प्रशासन ने मई 2025 में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) में बड़े बदलावों की घोषणा की, जिसका उद्देश्य इसकी संरचना को छोटा, अधिक कुशल और “अमेरिका फर्स्ट” नीति के अनुरूप बनाना है। इस पुनर्गठन में कर्मचारियों की संख्या में उल्लेखनीय कटौती शामिल है, जिसमें कई राजनीतिक नियुक्तियों को हटाया गया और कुछ सरकारी कर्मचारियों को उनकी मूल एजेंसियों में वापस भेजा गया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइक वाल्ट्ज की भूमिका पर भी चर्चा हुई, क्योंकि ट्रम्प ने NSC को सीधे अपने नियंत्रण में लाने की कोशिश की। यह कदम ट्रम्प की “छोटी सरकार” नीति का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य सरकारी खर्च और नौकरशाही को कम करना है। हालांकि, इस फेरबदल ने विशेषज्ञों के बीच चिंता पैदा की है, जो मानते हैं कि इससे साइबर सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी उपाय और वैश्विक खतरों से निपटने की क्षमता कमजोर हो सकती है। डेमोक्रेट्स ने इसे “लापरवाही भरा” कदम बताया, जबकि कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने इसका समर्थन किया। यह पुनर्गठन ट्रम्प के सलाहकारों, विशेष रूप से एलन मस्क के बजट-कटौती समूह, के साथ तनाव को भी उजागर करता है। यह कदम अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है।
बढ़ती राजनीतिक हिंसा की चिंता
अमेरिका में बढ़ती राजनीतिक हिंसा 2025 में एक गंभीर चिंता का विषय बन गई है, जो सामाजिक ध्रुवीकरण और तनाव का परिणाम है। हाल के वर्षों में, डोनाल्ड ट्रम्प पर 2024 में हत्या का प्रयास, 2020 में मिशिगन की गवर्नर ग्रेटचेन व्हिटमर के अपहरण की साजिश, और 22 मई, 2025 को वाशिंगटन डीसी में इजरायली दूतावास के कर्मचारियों पर हमला जैसी घटनाएँ इसकी मिसाल हैं। हार्वर्ड केनेडी स्कूल की प्रोफेसर एरिका चेनोवेथ के अनुसार, कोविड-19 महामारी के बाद से 1960 के दशक के बाद सबसे अधिक राजनीतिक हिंसा देखी गई है। ये घटनाएँ न केवल राजनेताओं, बल्कि मतदान कर्मियों और आम नागरिकों को भी प्रभावित कर रही हैं। X पर उपयोगकर्ताओं ने इसे “लोकतंत्र के लिए खतरा” बताया, जबकि कुछ इसे चरमपंथी समूहों द्वारा उकसावे का नतीजा मानते हैं। ट्रम्प प्रशासन की सख्त नीतियाँ, जैसे आप्रवासन और टैरिफ, इस हिंसा को और भड़का रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर कर सकती है, खासकर 2026 के मध्यावधि चुनावों से पहले। इस स्थिति से निपटने के लिए सामाजिक एकता और कड़े कानूनी उपायों की माँग बढ़ रही है।