मालेगांव विस्फोट केस में जस्टिस लाहोटी का सख्त रुख, कहा- ‘आतंकवाद को मजहब से जोड़ना गलत’,क्या है मालेगांव ब्लास्ट केस,जस्टिस लाहोटी ने क्या कहा,सोशल मीडिया पर भी हो रही चर्चा , क्यों है यह टिप्पणी अहम?
नई दिल्ली – मालेगांव ब्लास्ट केस (Malegaon Blast Case) में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस आर. सी. लाहोटी (Justice R.C. Lahoti) ने एक अहम टिप्पणी दी है जो देशभर में चर्चा का विषय बन गई है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “आतंकवाद (Terrorism) का कोई धर्म (Religion) नहीं होता और उसे मजहब से जोड़ना पूरी तरह गलत है।”
यह टिप्पणी उन्होंने केस की सुनवाई के दौरान देश में फैल रही धार्मिक ध्रुवीकरण (Religious Polarization) और आतंक को किसी विशेष धर्म से जोड़ने की प्रवृत्ति (Linking Terrorism to Religion) को लेकर दी।
क्या है मालेगांव ब्लास्ट केस?
2008 में महाराष्ट्र के मालेगांव (Malegaon, Maharashtra) में हुए धमाके में कई लोगों की जान गई थी और दर्जनों घायल हुए थे। इस मामले में कई आरोपियों पर UAPA, भारतीय दंड संहिता (IPC) और अन्य गंभीर धाराओं में मुकदमा चल रहा है।
मालेगांव धमाके को लेकर लंबे समय से यह बहस चल रही है कि क्या आतंकवादी घटनाओं को किसी धर्म से जोड़ा जाना चाहिए। जस्टिस लाहोटी की टिप्पणी ने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है।

जस्टिस लाहोटी ने क्या कहा?
“आतंक का कोई चेहरा नहीं होता, न ही कोई मजहब। आतंकवादियों को उनके कृत्यों से पहचाना जाना चाहिए, न कि उनकी धार्मिक पहचान से।”
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि न्यायपालिका (Judiciary) को किसी भी मामले में धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए और न्याय सिर्फ तथ्यों और सबूतों पर आधारित होना चाहिए।
क्यों है यह टिप्पणी अहम?
- भारत जैसे विविधता भरे देश में जब न्यायिक स्तर पर यह कहा जाता है कि धर्म के नाम पर आतंक की पहचान नहीं हो सकती, तो यह समाज में एक मजबूत संदेश देता है।
- इससे धर्मनिरपेक्षता (Secularism) को बल मिलता है और गैर-धार्मिक न्याय प्रक्रिया (Impartial Justice) की नींव और मजबूत होती है।

सोशल मीडिया पर भी हो रही चर्चा
जस्टिस लाहोटी की यह टिप्पणी अब सोशल मीडिया, न्यूज चैनलों और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन चुकी है। कई लोगों ने इसे “साहसी बयान” बताया है, वहीं कुछ आलोचकों का मानना है कि इस तरह की टिप्पणियों से केस की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
मालेगांव विस्फोट केस में जस्टिस लाहोटी की टिप्पणी ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि आतंकवाद किसी एक धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करता। ऐसे वक्त में जब धर्म और राजनीति की लकीरें धुंधली होती जा रही हैं, यह बयान न्याय, निष्पक्षता और इंसानियत की आवाज बनकर सामने आया है।