वैश्विक जलवायु संकट (Global Climate Crisis)

वैश्विक जलवायु संकट (Global Climate Crisis) आज विश्व के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। वैश्विक जलवायु संकट आज दुनिया की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है, जो मानव जीवन, पारिस्थितिकी तंत्र और अर्थव्यवस्थाओं को व्यापक रूप से प्रभावित कर रहा है। 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा, जिसमें वैश्विक औसत तापमान पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री सेल्सियस सीमा को पार कर 1.60 डिग्री सेल्सियस तक पहुँचा। यूरोप सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप है, जहाँ तापमान 2.19 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। चरम मौसमी घटनाएँ जैसे तूफान, बाढ़, जंगल की आग और सूखा बढ़ रहे हैं, जिनसे अरबों डॉलर का नुकसान और लाखों लोगों का विस्थापन हो रहा है। समुद्र स्तर में 8-9 इंच की वृद्धि और आर्कटिक-अंटार्कटिक बर्फ का तेजी से पिघलना जैव विविधता और तटीय क्षेत्रों के लिए खतरा बन रहा है। गर्मी से होने वाली मौतें 37% बढ़ी हैं, और 333 मिलियन लोग खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। COP29 में अमीर देशों ने 2035 तक 300 अरब डॉलर प्रतिवर्ष देने का वादा किया, लेकिन यह विकासशील देशों की जरूरतों से कम है। नवीकरणीय ऊर्जा और प्रकृति-आधारित समाधानों में प्रगति के बावजूद, उत्सर्जन में कमी और अनुकूलन के लिए तत्काल वैश्विक सहयोग की आवश्यकता है।

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रिकॉर्ड तोड़ तापमान: 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष दर्ज किया गया, जिसमें वैश्विक औसत तापमान 1850-1900 की आधार रेखा की तुलना में 1.60 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा, जो पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार करता है। यूरोप सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप रहा, जहाँ 1980-2023 के बीच भूमि का तापमान 2.12-2.19 डिग्री सेल्सियस बढ़ा। भारत और दक्षिण एशिया में भी 2024 में गर्मी की लहरों ने रिकॉर्ड तोड़े, जिससे कई शहरों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक पहुँचा। इन तापमानों ने न केवल मानव स्वास्थ्य को प्रभावित किया, बल्कि खाद्य उत्पादन, जल संसाधनों और ऊर्जा खपत पर भी गंभीर असर डाला। गर्मी से होने वाली मौतें 37% बढ़ी हैं, खासकर बुजुर्गों में, और X पर चर्चाएँ चेतावनी दे रही हैं कि 2050 तक भारत और पाकिस्तान जैसे क्षेत्रों में तापमान मानव सहनशक्ति की सीमा को पार कर सकता है। यह स्थिति जलवायु परिवर्तन के खिलाफ तत्काल कार्रवाई, जैसे नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना और उत्सर्जन में कटौती, की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

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चरम मौसमी घटनाएँ: वैश्विक जलवायु संकट के कारण चरम मौसमी घटनाएँ (Extreme Weather Events) दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही हैं, जो 24 मई 2025 तक एक गंभीर वैश्विक चुनौती बनी हुई हैं। 2024 में तूफान, बाढ़, जंगल की आग और सूखे ने अभूतपूर्व स्तर पर तबाही मचाई, जिससे अरबों डॉलर का आर्थिक नुकसान और लाखों लोगों का विस्थापन हुआ। उदाहरण के लिए, अमेरिका में तूफान हेलेन और मिल्टन ने 50 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान किया, जिसमें हेलेन से 200 से अधिक मौतें हुईं। दक्षिण एशिया, विशेष रूप से भारत और बांग्लादेश, में मॉनसून से संबंधित बाढ़ ने लाखों लोगों को प्रभावित किया, जबकि यूरोप में 1980-2023 के बीच मौसम से संबंधित घटनाओं से 738 अरब यूरो का नुकसान हुआ। जंगल की आग उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ी, और सूखे ने अफ्रीका और एशिया में खाद्य असुरक्षा को बढ़ाया, जिससे 2023 तक 333 मिलियन लोग तीव्र खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे थे। X पर चर्चाएँ भारत और पाकिस्तान में 2050 तक रेगिस्तानीकरण और चरम गर्मी की चेतावनी दे रही हैं, जो कृषि और जल संसाधनों पर भारी दबाव डालेगा। ये घटनाएँ जलवायु परिवर्तन के कारण तेज हो रही हैं, और विश्व मौसम संगठन (WMO) की “Early Warnings for All” पहल जैसी प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों के साथ-साथ वैश्विक उत्सर्जन में कटौती और अनुकूलन उपायों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।

समुद्र स्तर में वृद्धि: वैश्विक जलवायु संकट के परिणामस्वरूप समुद्र स्तर में वृद्धि (Sea Level Rise) एक गंभीर वैश्विक समस्या बन चुकी है, जो 24 मई 2025 तक की स्थिति में तटीय क्षेत्रों, पारिस्थितिकी तंत्रों और मानव बस्तियों के लिए बड़ा खतरा पैदा कर रही है। 1880 से अब तक वैश्विक समुद्र स्तर औसतन 8-9 इंच (21-24 सेमी) बढ़ चुका है, और सैटेलाइट युग (1993 के बाद) में यह वृद्धि दर तेज होकर 3.7 मिमी प्रति वर्ष हो गई है। 2024 में, ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों और ध्रुवीय बर्फ (विशेष रूप से ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका) के तेजी से पिघलने ने इस समस्या को और गंभीर किया। यदि उत्सर्जन उच्च स्तर पर बना रहा, तो 2100 तक समुद्र स्तर 2 मीटर तक बढ़ सकता है, जिससे भारत जैसे देशों में मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे तटीय शहरों के साथ-साथ बांग्लादेश और मालदीव जैसे निचले इलाकों में भारी तबाही मच सकती है। X पर चर्चाएँ चेतावनी दे रही हैं कि भारत के तटीय क्षेत्रों में 2050 तक लाखों लोग विस्थापित हो सकते हैं। समुद्र स्तर की वृद्धि प्रवाल भित्तियों (कोरल रीफ्स) और तटीय जैव विविधता को भी नष्ट कर रही है, जिससे मछली पकड़ने और पर्यटन जैसे उद्योग प्रभावित हो रहे हैं। विश्व बैंक और यूएन जैसे संगठन तटीय बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और अनुकूलन उपायों जैसे बांध निर्माण और मैंग्रोव पुनर्जनन को बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन वित्तीय और तकनीकी अंतर अभी भी चुनौती बने हुए हैं।

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प्रमुख प्रभाव और चुनौतियाँ

वैश्विक जलवायु संकट के कारण समुद्र स्तर में वृद्धि, चरम मौसमी घटनाएँ, और रिकॉर्ड तोड़ तापमान ने दुनिया भर में गंभीर प्रभाव और चुनौतियाँ पैदा की हैं, जो 24 मई 2025 तक की स्थिति में मानव जीवन, पारिस्थितिकी तंत्र, और अर्थव्यवस्थाओं को व्यापक रूप से प्रभावित कर रही हैं। समुद्र स्तर में 8-9 इंच (21-24 सेमी) की वृद्धि ने तटीय शहरों जैसे भारत के मुंबई, चेन्नई, और बांग्लादेश के निचले क्षेत्रों को डूबने के खतरे में डाल दिया है, जिससे 2050 तक लाखों लोगों का विस्थापन संभावित है। प्रवाल भित्तियाँ (कोरल रीफ्स) 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि पर 70-90% तक नष्ट हो सकती हैं, जिससे मछली पकड़ने और पर्यटन उद्योग प्रभावित हो रहे हैं। चरम मौसमी घटनाएँ, जैसे 2024 में अमेरिका में तूफान हेलेन और मिल्टन (50 अरब डॉलर का नुकसान) और भारत में मॉनसून बाढ़, ने लाखों लोगों को विस्थापित किया और खाद्य असुरक्षा को बढ़ाया, जिसमें 333 मिलियन लोग तीव्र खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। गर्मी से होने वाली मौतें 37% बढ़ी हैं, विशेष रूप से बुजुर्गों में। आर्थिक नुकसान भी भारी है; यूरोप में 1980-2023 के बीच मौसम से संबंधित घटनाओं से 738 अरब यूरो का नुकसान हुआ। प्रमुख चुनौतियों में अपर्याप्त अनुकूलन वित्त (2030 तक 212 अरब डॉलर प्रति वर्ष की आवश्यकता के मुकाबले 63 अरब डॉलर उपलब्ध), विकासशील देशों में तकनीकी अंतर, और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी की धीमी प्रगति शामिल हैं। X पर चर्चाएँ भारत और पाकिस्तान में रेगिस्तानीकरण और 2050 तक अत्यधिक तापमान की चेतावनी दे रही हैं, जो कृषि और जल संसाधनों पर दबाव डालेगा। इन प्रभावों से निपटने के लिए तत्काल वैश्विक सहयोग, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा, और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की आवश्यकता है।

वैश्विक (World) प्रयास और नीतियाँ

वैश्विक जलवायु संकट से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने कई महत्वपूर्ण प्रयास और नीतियाँ अपनाई हैं, जो समुद्र स्तर में वृद्धि, चरम मौसमी घटनाओं और रिकॉर्ड तोड़ तापमान जैसे प्रभावों को कम करने (mitigation) और अनुकूलन (adaptation) पर केंद्रित हैं। 2015 में पेरिस समझौते ने 196 देशों को वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे और आदर्श रूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए प्रतिबद्ध किया, जिसमें 2030 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 43% कम करने और 2050 तक नेट-जीरो प्राप्त करने का लक्ष्य है। COP29 (2024) में, विकसित देशों ने विकासशील देशों के लिए 2035 तक प्रति वर्ष 300 अरब डॉलर जलवायु वित्त प्रदान करने का वादा किया, लेकिन यह 212-359 अरब डॉलर की अनुकूलन आवश्यकता से कम है। अनुकूलन प्रयासों में राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाएँ (NAPs) शामिल हैं, जो देशों को बाढ़, सूखा और समुद्र स्तर वृद्धि जैसे जोखिमों के लिए तैयार करने में मदद करती हैं। उदाहरण के लिए, तुवालु में समुद्र स्तर वृद्धि से बचाव के लिए भूमि पुनर्जनन और तटीय संरक्षण परियोजनाएँ चल रही हैं। प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ (जैसे विश्व मौसम संगठन की “Early Warnings for All” पहल) और प्रकृति-आधारित समाधान, जैसे मैंग्रोव पुनर्स्थापन, को बढ़ावा दिया जा रहा है। यूरोपीय ग्रीन डील 2050 तक जलवायु तटस्थता का लक्ष्य रखता है, जिसमें 2023 में 24.1% नवीकरणीय ऊर्जा उपयोग और 19% कम प्राथमिक ऊर्जा खपत हासिल की गई। हालांकि, चुनौतियाँ जैसे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता, अपर्याप्त वित्त (2020 में 83.3 अरब डॉलर के मुकाबले 100 अरब डॉलर का लक्ष्य अधूरा), और खनिज आपूर्ति श्रृंखला की कमियाँ बनी हुई हैं। X पर चर्चाएँ 2025 में नए राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं की आवश्यकता और जीवाश्म ईंधन सब्सिडी समाप्त करने की माँग को रेखांकित करती हैं। इन प्रयासों के बावजूद, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि वर्तमान कार्रवाइयाँ अपर्याप्त हैं, और वैश्विक सहयोग, नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश, और समावेशी नीतियों की तत्काल आवश्यकता है।

वैश्विक जलवायु तापमान: तालिका

पहलूविवरणप्रभावक्षेत्रीय स्थितिभविष्य के अनुमान
ऐतिहासिक तापमान वृद्धि1850-1900 की आधार रेखा से 2024 तक वैश्विक औसत तापमान 1.60 डिग्री सेल्सियस बढ़ा।गर्मी से 37% अधिक मौतें, खाद्य और जल संसाधनों पर दबाव।यूरोप: 2.12-2.19 डिग्री वृद्धि; भारत: 2024 में 45 डिग्री से अधिक।2100 तक 2.5-4 डिग्री वृद्धि (उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में)।
2024: सबसे गर्म वर्ष2024 में वैश्विक तापमान पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री सीमा को पार कर गया।फसल उत्पादन में कमी, स्वास्थ्य जोखिम, चरम मौसमी घटनाएँ।दक्षिण एशिया: गर्मी की लहरें; आर्कटिक: बर्फ पिघलने की तीव्रता।2030 तक 1.5 डिग्री स्थायी उल्लंघन संभव।
क्षेत्रीय तापमान रुझानयूरोप सबसे तेजी से गर्म, 1980-2023 में 2.19 डिग्री वृद्धि।जैव विविधता हानि, ऊर्जा खपत में वृद्धि।भारत-पाकिस्तान: गर्मी की लहरें; अफ्रीका: सूखा बढ़ा।2050 तक भारत में असहनीय तापमान का खतरा।
स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभावगर्मी से बुजुर्गों में 70% अधिक मौतें, 333 मिलियन लोग खाद्य असुरक्षा में।आर्थिक नुकसान: यूरोप में 738 अरब यूरो (1980-2023)।दक्षिण एशिया: कृषि प्रभावित; तटीय क्षेत्रों में विस्थापन।2100 तक 1,266 ट्रिलियन डॉलर की निष्क्रियता लागत।
वैश्विक प्रयासपेरिस समझौता: 2030 तक 43% उत्सर्जन कटौती, नेट-जीरो 2050।नवीकरणीय ऊर्जा में प्रगति: 2023 में 24.1% उपयोग।COP29: 300 अरब डॉलर/वर्ष वित्त का वादा।तत्काल उत्सर्जन कटौती और अनुकूलन वित्त की आवश्यकता।

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  • flasahsamachar

    मैं संजना डोंगरे, हिंदी ब्लॉगर और कंटेंट क्रिएटर हूं। पिछले 5 सालों से टेक्नोलॉजी, डिजिटल मार्केटिंग और न्यूज़ पर 700+ आर्टिकल्स लिखे हैं। मेरा उद्देश्य है पाठकों तक सरल व भरोसेमंद जानकारी पहुँचाना।

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