Shibu soren news क्या शिबू सोरेन फिर से लौटेंगे सक्रिय राजनीति में? अंदर की पूरी खबर.निधन की पुष्टि और पूरे राज्य में शोक की लहर, क्या शिबू सोरेन सक्रिय राजनीति में लौट सकते थे?,शिबू सोरेन की राजनीतिक यात्रा,राजनीतिक विरासत: अब क्या?
झारखंड की राजनीति के सबसे मजबूत और ऐतिहासिक चेहरों में से एक शिबू सोरेन, जिन्हें लोग सम्मानपूर्वक ‘दिशोम गुरु’ के नाम से जानते हैं, अब हमारे बीच नहीं रहे। 4 अगस्त 2025 को उनका दिल्ली में निधन हो गया। इस खबर ने न केवल झारखंड बल्कि पूरे देश की राजनीति को झकझोर कर रख दिया है।
निधन की पुष्टि और पूरे राज्य में शोक की लहर
शिबू सोरेन पिछले कुछ समय से गंभीर रूप से बीमार चल रहे थे। उन्हें दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ ICU में उनका इलाज चल रहा था। परिवार और पार्टी कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि ‘गुरुजी’ एक बार फिर ठीक होकर लौटेंगे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
4 अगस्त की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। झारखंड सरकार ने 3 दिन का राजकीय शोक घोषित किया और सभी सरकारी कार्यालयों को बंद रखा गया।
क्या शिबू सोरेन सक्रिय राजनीति में लौट सकते थे?
हाल के वर्षों में शिबू सोरेन सक्रिय राजनीति से थोड़ा दूर हो चुके थे। हालांकि वे राज्यसभा सांसद थे और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संरक्षक के रूप में पार्टी के मार्गदर्शक बने हुए थे।
उनकी उम्र, सेहत और राजनीतिक जिम्मेदारियों को देखते हुए उनके दोबारा सक्रिय होने की संभावनाएँ पहले से ही बहुत कम थीं। उनकी स्थिति को देखते हुए यह सवाल सिर्फ समय का था — और अब उनके निधन के साथ इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट रूप से ‘नहीं’ हो गया है।

शिबू सोरेन की राजनीतिक यात्रा
झारखंड राज्य के गठन के लिए लंबा संघर्ष किया
तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे
केंद्र सरकार में कोयला मंत्री भी रहे
आदिवासी अधिकारों की आवाज बने
जीवन में कई विवादों और मुकदमों का सामना किया लेकिन फिर भी राजनीतिक पहचान बनाए रखी

राजनीतिक विरासत: अब क्या?
अब सवाल उठता है — शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत कौन आगे बढ़ाएगा?
इसका उत्तर उनके बेटे हेमंत सोरेन हैं, जो झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री हैं और पार्टी की कमान भी संभाल रहे हैं।
हेमंत सोरेन के लिए यह एक भावनात्मक और राजनीतिक रूप से कठिन समय है। एक ओर उन्हें अपने पिता की कमी झेलनी है, दूसरी ओर पार्टी को एकजुट रखना और आगे बढ़ाना भी।
- शिबू सोरेन अब इस दुनिया में नहीं हैं, इसलिए सक्रिय राजनीति में वापसी का सवाल यहीं समाप्त होता है।
- उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता — उन्होंने झारखंड को एक पहचान दी और आदिवासी समाज को आवाज़।
- अब झारखंड की राजनीति उनके दिखाए मार्ग पर आगे बढ़ेगी, लेकिन ‘गुरुजी’ जैसा नेता शायद ही फिर कभी मिले।