NDA ने उपराष्ट्रपति पद के लिए चुना महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को: जानिए उनके राजनीतिक सफर की पूरी कहानी
नई दिल्ली, 18 अगस्त 2025: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने आगामी उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए एक अनुभवी और समर्पित नेता को अपना उम्मीदवार चुना है। महाराष्ट्र के वर्तमान राज्यपाल और तमिलनाडु से आने वाले सीपी राधाकृष्णन को NDA की ओर से उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया गया है।
यह फैसला बीजेपी की संसदीय बोर्ड की बैठक में लिया गया, जो 9 सितंबर को होने वाले चुनावों के लिए एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है। राधाकृष्णन, जो लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के स्वयंसेवक रहे हैं, तमिलनाडु के पूर्व सांसद और कई राज्यों के राज्यपाल के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उनके इस नामांकन से बीजेपी दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
सीपी राधाकृष्णन का प्रारंभिक जीवन और आरएसएस से जुड़ाव
सीपी राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरुपुर जिले में हुआ था, जो राज्य के पश्चिमी हिस्से में स्थित है। मात्र 16 साल की उम्र में उन्होंने RSS से जुड़कर अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत की। आरएसएस की विचारधारा से गहराई से प्रभावित राधाकृष्णन ने संगठन के मूल्यों को अपने जीवन का हिस्सा बनाया। उन्होंने जनसंघ के साथ भी काम किया और धीरे-धीरे बीजेपी के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए। उनकी यह पृष्ठभूमि उन्हें एक समर्पित हिंदुत्ववादी नेता के रूप में स्थापित करती है, लेकिन वे व्यावहारिक दृष्टिकोण के लिए भी जाने जाते हैं। राजनीति में आने से पहले वे व्यापार और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहे, जिसने उन्हें आम लोगों से जोड़ने में मदद की।
उनकी RSS से जुड़ी छवि हमेशा से बीजेपी के लिए एक मजबूत आधार रही है। सहयोगी उन्हें संघ परिवार की विचारधारा में गहराई से रचे-बसे लेकिन क्रियान्वयन में लचीले नेता के रूप में देखते हैं। तमिलनाडु जैसे राज्य में, जहां बीजेपी को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, राधाकृष्णन ने अपनी साफ-सुथरी छवि से पार्टी को मजबूती दी है। वे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और भ्रष्टाचार के आरोपों से काफी हद तक दूर रहे हैं, जो उन्हें एक विश्वसनीय चेहरा बनाता है।
राजनीतिक करियर: लोकसभा सांसद से बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष तक
राधाकृष्णन का राजनीतिक सफर 1990 के दशक के अंत में चरम पर पहुंचा जब उन्होंने 1998 और 1999 में कोयंबटूर लोकसभा सीट से चुनाव जीता। ये जीत तमिलनाडु में बीजेपी के लिए ऐतिहासिक थीं, क्योंकि उन्होंने बड़े अंतर से जीत हासिल की। कोयंबटूर, जो औद्योगिक केंद्र है, में उनकी लोकप्रियता ने पार्टी को पश्चिमी तमिलनाडु में पैर जमाने में मदद की। सांसद के रूप में उन्होंने विकास कार्यों पर जोर दिया और स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया।
2004 से 2007 तक वे तमिलनाडु बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे। इस दौरान उन्होंने पार्टी संगठन को मजबूत किया और युवा कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित किया। बाद में वे बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने। उनकी नेतृत्व शैली को अनुशासित और परिणाम-उन्मुख माना जाता है। तमिलनाडु में DMK और AIAडDMK जैसी मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों के बीच बीजेपी को बढ़ावा देने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि राधाकृष्णन की वजह से ही पार्टी राज्य में अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाई है।

राज्यपाल के रूप में सेवाएं: झारखंड से महाराष्ट्र तक
फरवरी 2023 में राधाकृष्णन को झारखंड का राज्यपाल बनाया गया। यहां उन्होंने राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर काम किया। उनका फोकस आदिवासी और वंचित समुदायों के विकास पर रहा। उन्होंने राज्य और केंद्र सरकार के बीच सेतु का काम किया और संवैधानिक सीमाओं का सम्मान किया। झारखंड में उनके कार्यकाल को गैर-विवादास्पद माना गया, जो दक्षिणी राज्यों में राज्यपालों की भूमिका पर उठने वाले सवालों के बीच एक सकारात्मक उदाहरण था।
जुलाई 2024 में उन्हें महाराष्ट्र का राज्यपाल बनाया गया। लोकसभा चुनावों में एनडीए के कमजोर प्रदर्शन के बाद यह नियुक्ति महत्वपूर्ण थी। महाराष्ट्र में उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से अच्छे संबंध बनाए रखे। उदाहरण के लिए, जब महाराष्ट्र स्पेशल पब्लिक सिक्योरिटी बिल जैसे विवादास्पद मुद्दे आए, तो उन्होंने विपक्षी नेताओं से मुलाकात की और संतुलित फैसले लिए। उनके इस दृष्टिकोण ने उन्हें एक निष्पक्ष नेता की छवि दी है।
एक दिलचस्प घटना 2023 की है, जब तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म के खिलाफ बयान दिया था। तब झारखंड राज्यपाल के रूप में राधाकृष्णन ने कड़ा जवाब दिया और कहा कि हिंदू परंपराओं को नष्ट करने की कोशिश करने वाले खुद नष्ट हो जाएंगे। यह बयान उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
उपराष्ट्रपति पद के लिए क्यों चुना गया राधाकृष्णन?
बीजेपी का यह फैसला रणनीतिक है। राधाकृष्णन के दशकों के राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक कौशल और मॉडरेशन की छवि ने उन्हें इस पद के लिए उपयुक्त बनाया है। तमिलनाडु से होने के कारण बीजेपी दक्षिण भारत में अपनी अपील बढ़ा सकती है। एक वरिष्ठ DMK नेता ने उन्हें “गलत पार्टी में अच्छा आदमी” कहा है, जो उनकी क्रॉस-पॉलिटिकल अपील को दिखाता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से तुलना भी उनकी लोकप्रियता को रेखांकित करती है।

उपराष्ट्रपति चुनाव 2025 में राधाकृष्णन का नामांकन NDA की मजबूती को दर्शाता है। यदि वे जीतते हैं, तो यह बीजेपी के लिए एक बड़ा मील का पत्थर होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका संतुलित दृष्टिकोण संसद के ऊपरी सदन (राज्यसभा) के अध्यक्ष के रूप में उपयोगी साबित होगा।
सीपी राधाकृष्णन की यह यात्रा प्रेरणादायक है – एक साधारण आरएसएस स्वयंसेवक से उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार तक। तमिलनाडु और पूरे देश में उनके समर्थक इस फैसले से उत्साहित हैं। चुनाव परिणाम क्या होगा, यह तो समय बताएगा, लेकिन राधाकृष्णन का नाम अब भारतीय राजनीति के इतिहास में दर्ज हो चुका है।