रूस-यूक्रेन संघर्ष एक जटिल और लंबे समय से चल रहा अंतरराष्ट्रीय विवाद है, जो 2014 में शुरू हुआ और 2022 में रूस के पूर्ण पैमाने पर आक्रमण के साथ और गहरा गया। यह युद्ध न केवल यूक्रेन और रूस के बीच, बल्कि वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर भी गहरा प्रभाव डाल रहा है। नीचे इस संघर्ष के प्रमुख पहलुओं को हिंदी में संक्षेप में समझाया गया है, जिसमें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, कारण, वर्तमान स्थिति और भारत के दृष्टिकोण को शामिल किया गया है।रूस-यूक्रेन संघर्ष एक जटिल भू-राजनीतिक संकट है, जिसके मूल में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक मुद्दे हैं। यह युद्ध न केवल यूक्रेन और रूस, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। भारत ने इस मामले में संतुलित रुख अपनाया है, शांति की वकालत करते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी है। युद्ध का अंत अभी अनिश्चित है, लेकिन वैश्विक नेताओं की कोशिशें और बातचीत की उम्मीद बनी हुई है।
संघर्ष (Conflict) के प्रमुख कारण
रूस-यूक्रेन संघर्ष, जो 2014 में शुरू हुआ और 2022 में पूर्ण पैमाने पर युद्ध में बदल गया, कई ऐतिहासिक, भू-राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारणों से उत्पन्न हुआ। 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद यूक्रेन एक स्वतंत्र देश बना। यूक्रेन पहले सोवियत संघ का हिस्सा था, और रूस के साथ इसके सांस्कृतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक रिश्ते गहरे थे। 2014 में, यूक्रेन में यूरोमैदान विरोध प्रदर्शन और रूस समर्थक राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच के अपदस्थ होने के बाद, रूस ने क्रीमिया पर कब्जा कर लिया और उसे अपने देश में मिला लिया। साथ ही, रूस समर्थित अलगाववादियों ने यूक्रेन के पूर्वी डोनबास क्षेत्र (डोनेत्स्क और लुहांस्क) में स्वतंत्र “गणराज्यों” की घोषणा की, जिससे डोनबास युद्ध शुरू हुआ।

रूस का मानना है कि यूक्रेन का पश्चिमी देशों, खासकर नाटो (North Atlantic Treaty Organization) और यूरोपीय संघ के साथ बढ़ता रिश्ता, उसके सुरक्षा हितों के लिए खतरा है। यूक्रेन ने 2014 के बाद नाटो में शामिल होने की इच्छा जताई, जिसे रूस ने अस्वीकार्य बताया।
- भू-राजनीतिक तनाव: रूस, यूक्रेन को अपने प्रभाव क्षेत्र में रखना चाहता है, जबकि यूक्रेन पश्चिमी देशों के साथ एकीकरण की दिशा में बढ़ रहा है।
- क्रीमिया का कब्जा: 2014 में रूस द्वारा क्रीमिया के अवैध विलय ने दोनों देशों के बीच तनाव को बढ़ाया।
- डोनबास में अलगाववाद: रूस समर्थित डोनेत्स्क और लुहांस्क “गणराज्यों” ने यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती दी।
- नाटो का विस्तार: रूस का दावा है कि नाटो का पूर्वी यूरोप में विस्तार उसकी सुरक्षा के लिए खतरा है।
- ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दावे: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन को ऐतिहासिक रूप से रूस का हिस्सा बताया और इसे “नोवोरोसिया” (नया रूस) के रूप में देख anywhere called it quits.
2022 का पूर्ण पैमाने पर आक्रमण
24 फरवरी 2022: रूस ने यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर सैन्य आक्रमण शुरू किया, जिसे पुतिन ने “विशेष सैन्य अभियान” कहा। इसका उद्देश्य डोनेत्स्क और लुहांस्क क्षेत्रों को “मुक्त” करना और यूक्रेन को नाटो से दूर रखना बताया गया।
युद्ध के कारण 80 लाख से अधिक यूक्रेनियन देश छोड़कर शरणार्थी बन गए, और 80 लाख लोग देश के भीतर विस्थापित हुए। 10,000 से अधिक नागरिकों की मौत और लगभग 20,000 घायल हुए। रूस ने बेलारूस और क्रीमिया से कीव, खार्किव, और अन्य शहरों पर हमले शुरू किए। यूक्रेन की सेना और नागरिकों ने कड़ा प्रतिरोध दिखाया, जिससे रूस कीव पर कब्जा करने में असफल रहा।बाखमुत, मारियुपोल, और खेर्सन जैसे शहरों में भारी लड़ाई हुई, जिसमें हजारों लोग मारे गए।

रूस-यूक्रेन संघर्ष (Conflict) की वर्तमान स्थिति
मई 2025 तक, रूस-यूक्रेन संघर्ष अपने तीसरे वर्ष में प्रवेश कर चुका है और यह यूरोप का सबसे घातक युद्ध बना हुआ है, जिसमें रूस ने यूक्रेन के लगभग 20% क्षेत्र पर कब्जा कर रखा है। युद्ध अब एक स्थिर, खाइयों जैसे युद्ध में बदल गया है, जिसमें डोनबास (डोनेत्स्क और लुहांस्क) और अन्य क्षेत्रों में दोनों पक्ष ड्रोन, मिसाइलों और तोपखाने का उपयोग कर रहे हैं। रूस ने 2024 में डोनबास में धीमी प्रगति की, जिसमें पोकरोव्स्क और तोरेत्स्क जैसे क्षेत्रों में बढ़त हासिल की, लेकिन यूक्रेन ने कुर्स्क क्षेत्र में जवाबी हमले किए, जिसमें 2024 में शुरू हुआ कुर्स्क आक्रमण शामिल है। मई 2025 में तुर्की के इस्तांबुल में दोनों देशों के बीच शांति वार्ता हुई, लेकिन रूस के निम्न-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल और क्षेत्रीय माँगों (जैसे यूक्रेन से क्षेत्र छोड़ने की माँग) के कारण कोई प्रगति नहीं हुई। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने पुतिन के साथ आमने-सामने बातचीत की माँग की, जिसे रूस ने ठुकरा दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध को समाप्त करने के लिए दबाव बढ़ाया, लेकिन उनकी मध्यस्थता के प्रयास विफल रहे। रूस ने यूक्रेन के बुनियादी ढाँचे, विशेष रूप से ऊर्जा ग्रिड, पर हमले तेज किए, जिससे सर्दियों में मानवीय संकट गहरा सकता है। यूक्रेन ने रूसी क्षेत्रों, जैसे लिपेत्स्क में स्टील प्लांट, पर ड्रोन हमले किए। युद्ध में 10,000 से अधिक नागरिक मारे गए, 80 लाख लोग विस्थापित हुए, और 82 लाख से अधिक शरणार्थी बने। भारत ने तटस्थ रुख बनाए रखा, मानवीय सहायता प्रदान की, और शांति की वकालत की, लेकिन रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा। विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध लंबा खिंच सकता है, क्योंकि दोनों पक्ष हार मानने को तैयार नहीं हैं, और शांति वार्ता की संभावनाएँ कमजोर हैं।
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