बाघ के हमले में महिला मृत फिर चरवाहा बना शिकार [Chandrapur Mul Tiger]

14 दिन में 5 लोगों को बनाया शिकार

चंद्रपुर / मूलः जंगल में लकड़ियां इकट्ठा करने गई महिला पर बाघ ने हमला कर दिया, उसकी मौके पर ही मौत हो गई. यह घटना मंगलवार 27 मई को सुबह 8 बजे मूल तहसील के भगवानपुर गांव के पास के वन विकास निगम के कक्ष क्रमांक 524 में हुई. मृतक चिरौली निवासी संजीवनी माकलवार (45) है. ढाई घंटे बाद, करीब साढ़े दस बजे बाघ ने इसी परिसर में एक चरवाहे को भी अपना शिकार बनाया. मृतक सुरेश सोपनकार (52), कांतापेठ निवासी बताया गया. बाघ के हमले में दो लोगों की मौत के बाद भगवानपुर, कांतापेठ और टोलेवाही के गुस्साए लोगों ने यह निर्णय लिया कि वे सुरेश सोपनकार के शव को ले जाने की अनुमति नहीं देंगे. इससे तनाव का माहौल पैदा हो गया, एफडीसीएम के विभागीय प्रबंधक जी. ए. मोटकर सहयोगियों के साथ घटनास्थल पर पहुंचे और लोगों को शांत करने का प्रयास किया.एक अन्य घटना में संजय माकलवार पत्नी संजीवनी के साथ भगवानपुर गांव के बड़े पास वन विकास निगम के कक्ष क्रमांक 524 में लकड़ी लेने गए थे. तभी नाले के

14 दिन में 5 लोगों को बनाया शिकार

मूल तहसील में मानव-वन्यजीव संघर्ष चरम पर है. 12 मई 2025 को भादुर्णी की भूमिका मेंदारे, 19 मई को भादुर्णी के ऋषि पेंदोर, 22 मई को करवन के बंडू उराडे और 27 मई को चिरौली की संजीवनी माकलवार, कांतापेठ के सुरेश सोपनकार को बाघ ने शिकार बनाया.पास छुपे एक बाघ ने संजीवनी पर हमला कर दिया और उसे मौके पर ही मार डाला. पति ने शोर मचाया तो बाघ भाग गया. घटना की जानकारी मिलते ही ग्रामीण मौके पर पहुंच गए. वन विभाग के कर्मचारी और पुलिस मौके पर पहुंचे और पंचनामा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा. पत्नी को कंधे पर उठाकर 200 मीटरचला बाघ के भाग जाने के बाद, हताश संजय ने घायल संजीवनी को कंधों पर उठा लिया और लगभग 200 मीटर तक चला. लेकिन जैसे ही उसे अहसास हुआ कि उसकी पत्नी ने हलचल बंद कर दी है तब उसने उसे नीचे उतारा और फूट-फूट कर रोने लगा.

पहली घटना: महिला पर बाघ का हमला

पहली घटना सुबह के समय चिरोली गांव में हुई, जहां 45 वर्षीय नंदा संजय मकालवार अपने पति और कुछ अन्य लोगों के साथ जंगल में बांस की लकड़ियां इकट्ठा करने गई थीं। इसी दौरान एक बाघ ने उन पर हमला कर दिया, जिससे उनकी मौके पर ही मृत्यु हो गई। नंदा की चीख सुनकर उनके पति और अन्य लोग मदद के लिए दौड़े, लेकिन बाघ उन्हें शिकार बनाकर जंगल में भाग गया। घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग और पुलिस की टीमें मौके पर पहुंचीं, और शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया।

दूसरी घटना: चरवाहे की दर्दनाक मौत

उसी दिन दोपहर में, चिचपल्ली वन क्षेत्र के कंतापेठ गांव में 52 वर्षीय सुरेश सोपणकर पर बाघ ने हमला किया। सुरेश अपने मवेशियों को चराने जंगल गए थे, जब बाघ ने उन पर अचानक हमला कर दिया, जिससे उनकी भी मौके पर मृत्यु हो गई। इस घटना ने क्षेत्र में दहशत को और बढ़ा दिया, क्योंकि यह एक ही दिन में दूसरा हमला था।

बाघ के हमले में महिला मृत फिर चरवाहा बना शिकार [Chandrapur Mul Tiger]

वन विभाग की कार्रवाई

इन घटनाओं के बाद वन विभाग ने तत्काल कार्रवाई शुरू की। विभाग ने पहले से ही क्षेत्र में बाघों की निगरानी के लिए 34 ट्रैप कैमरे और 8 लाइव कैमरे लगाए थे, जिसके परिणामस्वरूप 12 मई को एक बाघिन को बेहोश कर पिंजरे में कैद किया गया था। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि हाल की घटनाओं में हमला करने वाला बाघ वही है या कोई और। वन विभाग ने अब निगरानी बढ़ाने और ग्रामीणों को जंगल में न जाने की सलाह दी है। साथ ही, हमलावर बाघ की पहचान के लिए अतिरिक्त कैमरे लगाए जा रहे हैं, और इसके शावक की तलाश भी जारी है। वन विभाग के अधिकारियों ने ग्रामीणों को सतर्क रहने और समूह में जंगल जाने की सलाह दी है। विभाग ने मृतकों के परिवारों को तत्काल 50,000 रुपये की प्रारंभिक सहायता प्रदान की है, और कागजी कार्यवाही पूरी होने के बाद शेष मुआवजे का वादा किया है।

सामाजिक प्रतिक्रियाएं और ग्रामीणों में आक्रोश

इन लगातार हमलों ने स्थानीय समुदाय में भय और आक्रोश पैदा कर दिया है। ग्रामीणों ने वन विभाग पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए तत्काल कार्रवाई और बाघ को पकड़ने की मांग की है। कई गांवों में लोग जंगल में तेंदू पत्ता इकट्ठा करने या मवेशी चराने से डर रहे हैं, क्योंकि यह उनकी आजीविका का प्रमुख साधन है, लेकिन अब यह जानलेवा खतरा बन गया है। सोशल मीडिया, विशेष रूप से एक्स पर, लोगों ने इन घटनाओं पर गुस्सा जाहिर किया है और सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग की है। चंद्रपुर जिला, जो ताडोबा अंधारी टाइगर रिजर्व के लिए प्रसिद्ध है, में लगभग 220 बाघ हैं। 2025 में अब तक बाघ के हमलों में 17 लोगों की जान जा चुकी है, जिसमें से 11 मौतें मई महीने में हुई हैं। यह मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीर समस्या को दर्शाता है। तेंदू पत्ता संग्रहण का मौसम, जो ग्रामीणों की आजीविका का प्रमुख साधन है, अब खतरे का पर्याय बन गया है। चंद्रपुर की मूल तहसील में बाघ के हमलों ने एक बार फिर मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता को उजागर किया है। नंदा मकालवार और सुरेश सोपणकर की मृत्यु ने न केवल उनके परिवारों, बल्कि पूरे समुदाय को गहरे दुख में डुबो दिया है। वन विभाग की त्वरित कार्रवाई और ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाना अब समय की मांग है। साथ ही, सरकार को दीर्घकालिक उपाय, जैसे बाड़बंदी, जागरूकता अभियान, और वैकल्पिक आजीविका के अवसर प्रदान करने की जरूरत है,

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    मेरा नाम Tanmay patil “मैं एक हिंदी न्यूज़ ब्लॉग लिखता हूं, पिछले 2 सालों से ताज़ा खबरें, राजनीति और समाज से जुड़ी सटीक व रोचक जानकारियाँ पाठकों तक पहुँचाने का काम कर रहा हूं।”

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