विश्व पोलियो दिवस: इतिहास, महत्व, भारत की ऐतिहासिक जीत और पोलियो-मुक्त दुनिया का संकल्प

इतिहास गवाह है कि जब मानवता विज्ञान, सामूहिक प्रयास और दृढ़ संकल्प के साथ किसी चुनौती का सामना करती है, तो असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। विश्व पोलियो दिवस (24 अक्टूबर) इसी सामूहिक जीत और अधूरे लक्ष्य को पूरा करने के संकल्प का प्रतीक है। एक समय था, जब पोलियो लाखों बच्चों को स्थायी शारीरिक दिव्यांगता का शिकार बना देता था और कई की जान भी ले लेता था। लेकिन वैज्ञानिक खोज, प्रभावी टीकाकरण और स्वास्थ्य कर्मियों के अथक प्रयासों ने इस बीमारी के प्रसार को काफी हद तक नियंत्रित किया है।

भारत का पोलियो-मुक्त होना जनभागीदारी, सरकारी प्रयासों और व्यापक टीकाकरण अभियान की ऐतिहासिक सफलता का प्रमाण है। यह उपलब्धि बताती है कि समाज की सक्रिय भागीदारी और निरंतर प्रयासों से गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों पर विजय पाई जा सकती है। हालांकि, दुनिया के कुछ हिस्सों में पोलियो वायरस का प्रसार अब भी चिंता का विषय है। जब तक किसी भी क्षेत्र में इसका खतरा बना रहेगा, तब तक वैश्विक पोलियो उन्मूलन का लक्ष्य अधूरा रहेगा।

विश्व पोलियो दिवस का इतिहास और महत्व

विश्व पोलियो दिवस की शुरुआत रोटरी इंटरनेशनल ने जोनास साल्क के जन्मदिन की स्मृति में की थी। साल्क का जन्म 28 अक्टूबर 1914 को हुआ था। उन्होंने पोलियो के पहले प्रभावी टीके के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में अल्बर्ट साबिन ने ओरल पोलियो वैक्सीन के विकास में योगदान दिया, जिससे बड़े स्तर पर टीकाकरण अभियान चलाने में सहायता मिली।

वर्ष 1988 में विश्व स्वास्थ्य संगठन, रोटरी इंटरनेशनल, यूनिसेफ और अन्य साझेदारों ने वैश्विक पोलियो उन्मूलन पहल शुरू की। इसका उद्देश्य पोलियो वायरस के प्राकृतिक प्रसार को रोकना और दुनिया को इस बीमारी से मुक्त करना था। इस अभियान के बाद अनेक देशों में पोलियो के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई। यह दिवस इस वैश्विक प्रयास की उपलब्धियों को सामने लाने के साथ उन चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाता है, जिन्हें दूर किए बिना बीमारी का पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं है।

पोलियो क्या है और इसके लक्षण?

पोलियो या पोलियोमाइलाइटिस एक संक्रामक बीमारी है, जो पोलियो वायरस के कारण होती है। यह मुख्य रूप से पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करती है। वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद आंतों में बढ़ता है और कुछ मामलों में तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकता है, जिससे शरीर के किसी हिस्से में लकवा हो सकता है। यह वायरस मुख्यतः संक्रमित व्यक्ति के मल से दूषित पानी या भोजन के माध्यम से फैलता है।

  • सामान्य लक्षण: बुखार, थकान, सिरदर्द, उल्टी, गर्दन में अकड़न और हाथ-पैरों में दर्द।

  • गंभीर परिणाम: मांसपेशियों में अचानक कमजोरी, लकवा (विशेषकर पैरों में), और सांस लेने वाली मांसपेशियां प्रभावित होने से जीवन पर संकट।

भारत में पोलियो उन्मूलन: जनभागीदारी की मिसाल

भारत में पोलियो उन्मूलन का अभियान सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है। देश में वर्ष 1995 में पल्स पोलियो टीकाकरण कार्यक्रम शुरू किया गया। स्वास्थ्य कर्मियों, आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कर्मियों, स्वयंसेवकों और स्थानीय समुदायों की बदौलत घर-घर जाकर बच्चों को टीका पिलाया गया।

भारत में जंगली पोलियो वायरस से संक्रमण का आखिरी मामला 13 जनवरी 2011 को दर्ज हुआ था। इसके बाद 27 मार्च 2014 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को पोलियो-मुक्त प्रमाणित किया। हालांकि, वायरस के आयात जोखिम और कम टीकाकरण वाले क्षेत्रों के कारण सतर्कता बनाए रखना बेहद जरूरी है।

बचाव के उपाय और मौजूदा चुनौतियां

पोलियो से बचाव के लिए दो मुख्य टीके उपयोग किए जाते हैं:

  1. ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV): मुंह से बूंदों के रूप में दी जाने वाली दवा।

  2. इनएक्टिवेटेड पोलियो वैक्सीन (IPV): इंजेक्शन के माध्यम से दी जाने वाली खुराक।

वर्तमान में उन दूरदराज और संघर्षग्रस्त क्षेत्रों तक पहुंचना सबसे बड़ी चुनौती है जहां स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं। युद्ध, विस्थापन और टीकों को लेकर फैली अफवाहें इस अभियान को प्रभावित करती हैं। जब तक हर बच्चे को समय पर टीका नहीं मिलता, तब तक पोलियो-मुक्त दुनिया का सपना पूरी तरह साकार नहीं हो सकता।

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