भारत स्वस्तिक यात्रा का झाँसी पड़ाव: मोरारी बापू ने कहा, स्वस्तिक का केंद्र बिंदु परब्रह्म परमात्मा हैं, जिनका नाम राम है


वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए पूज्य मोरारी बापू ने दिन की रामकथा वीरांगना को समर्पित की और स्वस्तिक के माध्यम से कल्याण, सत्य, समानता एवं सर्वस्वीकार का संदेश दिया

झाँसी, उत्तर प्रदेश, 16 अक्टूबर, 2026। पूज्य मोरारी बापू के नेतृत्व में भारत स्वस्तिक यात्रा के अंतर्गत 16 अक्टूबर को झाँसी में रामकथा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर रानी लक्ष्मीबाई को श्रद्धांजलि अर्पित की गई और साहस, बलिदान तथा देशभक्ति की झाँसी की गौरवशाली विरासत को नमन किया गया।

सुबह रेलवे स्टेशन पहुँचने के बाद पूज्य मोरारी बापू ने ऐतिहासिक झाँसी किले का दौरा किया और उस स्थल पर रानी लक्ष्मीबाई को नमन किया, जो अंग्रेजों की घेराबंदी के दौरान अपने बच्चे के साथ घोड़े पर सवार होकर किले से निकलने की उनकी ऐतिहासिक घटना से जुड़ा है। इसके बाद वे उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था। वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने राष्ट्रगान के दौरान सावधान मुद्रा में खड़े होकर राष्ट्र के प्रति सम्मान व्यक्त किया। रामकथा के पंडाल में कथा आरंभ होने से पहले उपस्थित जनसमूह ने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् का सामूहिक गायन किया।

रामकथा का आरंभ करते हुए पूज्य मोरारी बापू ने कहा, “शौर्य और धैर्य से भरपूर, वीरांगना लक्ष्मीबाई की चेतना को प्रणाम।” उन्होंने दिन की रामकथा वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के चरणों में समर्पित करते हुए भारतीय इतिहास में उनके असाधारण योगदान को नमन किया।

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 1828 में वाराणसी में मणिकर्णिका तांबे के रूप में हुआ था। वह 1857 में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध हुए विद्रोह की सबसे प्रतिष्ठित वीरांगनाओं में से एक बनीं। अंग्रेजों द्वारा डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स के तहत झाँसी को अपने अधिकार में लेने का प्रयास किए जाने के बाद उन्होंने 1857-58 के विद्रोह के दौरान नगर की रक्षा का नेतृत्व किया। झाँसी किले की घेराबंदी के बाद भी उन्होंने कालपी और ग्वालियर में संघर्ष जारी रखा। 18 जून, 1858 को 29 वर्ष की आयु में युद्ध करते हुए उन्होंने वीरगति प्राप्त की। उनकी विरासत आज भी राष्ट्रीय गौरव, प्रतिरोध और भारतीय इतिहास में नारी शक्ति का सशक्त प्रतीक है।

रामकथा के दौरान बापू ने स्वस्तिक के गहरे अर्थ पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसका एक अर्थ कल्याण है, अर्थात दूसरों का हित और मंगल। उन्होंने स्वस्तिक के चतुष्पद यानी चार मार्गों को देव मार्ग, पितृ मार्ग, गुरु मार्ग और सूर्य मार्ग के रूप में समझाया तथा इन चारों मार्गों के आध्यात्मिक महत्त्व को रेखांकित किया।

भारतीय धर्मग्रंथों के व्यापक दार्शनिक संदेश को समझाते हुए बापू ने कहा कि सत् अर्थात सत्य की अभिव्यक्ति उपनिषदों में, सम् अर्थात समानता का भाव भगवद्गीता में और सब अर्थात सभी को स्वीकार करने का भाव रामचरितमानस में मिलता है। उन्होंने कहा कि ये सिद्धांत सत्य, समानता और समावेशिता पर आधारित जीवन जीने का मार्ग प्रदान करते हैं।

स्वस्तिक के केंद्रीय संदेश पर जोर देते हुए मोरारी बापू ने कहा, “केंद्र बिंदु स्वस्तिक का परब्रह्म परमात्मा है, जिसका नाम राम है।” यह विचार स्वस्तिक के आध्यात्मिक अर्थ के केंद्र में भगवान राम को स्थापित करता है और समस्त सृष्टि के कल्याण का संदेश देता है।

बापू ने बलि प्रथा अर्थात पशुबलि को समाप्त करने की अपनी अपील भी दोहराई। उन्होंने कहा कि धार्मिक परंपराओं के कुछ संदर्भों में आज भी पशुबलि जारी है। उन्होंने आध्यात्मिक जगत में साहसपूर्ण निर्णय लेने का आह्वान किया और लोगों से आग्रह किया कि पशुबलि छोड़ने से अनिष्ट या किसी नकारात्मक परिणाम की आशंका के भय से ऊपर उठें।

उन्होंने आगे कहा कि यदि बलि की रस्मों में पशुओं के स्थान पर फलों का उपयोग किया जाता है, लेकिन मारने की मूल भावना में कोई बदलाव नहीं आता, तो उस पर भी पुनर्विचार किया जाना चाहिए। बापू के अनुसार, सबसे आवश्यक है मारने की *वृत्ति* अर्थात हिंसा की प्रवृत्ति और मानसिकता को ही समाप्त करना। उनकी अपील विचार और संकल्प में ऐसे गहरे परिवर्तन की थी, जिसकी नींव करुणा और जीवन के प्रति सम्मान पर टिकी हो।

भारत स्वस्तिक यात्रा का झाँसी पड़ाव शहर की ऐतिहासिक विरासत और यात्रा की आध्यात्मिक दृष्टि को एक साथ लेकर आया। रानी लक्ष्मीबाई को नमन कर और रामकथा उन्हें समर्पित करके बापू ने साहस, स्वाभिमान और बलिदान के मूल्यों को सनातन धर्म के व्यापक आदर्शों से जोड़ा।

यह यात्रा भारत की आध्यात्मिक विरासत, पवित्र भूगोल और राष्ट्रीय पहचान को जोड़ने की व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि के साथ आगे बढ़ रही है। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों पीठों और ओंकारेश्वर को शामिल करने के साथ-साथ, जिसका इस दार्शनिक संत से गहरा आध्यात्मिक संबंध है, यात्रा में भारत के राष्ट्रगान में उल्लिखित प्रत्येक राज्य और नदी को भी समाहित किया जा रहा है। सिंधु क्षेत्र के वर्तमान भारतीय सीमाओं से बाहर होने के कारण, भागा सीमा पर रामकथा का आयोजन इस व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि में विशेष महत्त्व रखता है।

हम्पी में तुंगभद्रा से लेकर नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर और झाँसी तक, यात्रा के विभिन्न पड़ाव भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के विविध आयाम प्रस्तुत करते हैं। यह यात्रा छत्रपति शिवाजी महाराज और रानी लक्ष्मीबाई जैसी विभूतियों को भी स्मरण करती है, जिनका जीवन आज भी साहस, स्वाभिमान और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा देता है।

भारत स्वस्तिक यात्रा का आयोजन संतकृपा सनातन संस्थान द्वारा पूज्य मोरारी बापू के मार्गदर्शन में किया जा रहा है।
झाँसी पड़ाव के महत्त्व पर बोलते हुए मदन पालीवाल, चेयरमैन, मिराज ग्रुप एवं मैनेजिंग ट्रस्टी, संतकृपा सनातन संस्थान ने कहा, “भारत के इतिहास में झाँसी का विशेष स्थान है, क्योंकि यह हमें रानी लक्ष्मीबाई के असाधारण साहस और बलिदान की याद दिलाती है। उनकी स्मृति को रामकथा समर्पित करके पूज्य मोरारी बापू ने भारत की विरासत के आध्यात्मिक और ऐतिहासिक पहलुओं को एक साथ जोड़ा है। यह यात्रा देश को एक सूत्र में बाँधने वाले मूल्यों को सुदृढ़ करने और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करने का प्रयास है।”

भारत स्वस्तिक यात्रा सत्य, प्रेम और करुणा के मूल्यों के माध्यम से सनातन धर्म की शाश्वत प्रासंगिकता को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास है। स्वस्तिक और उससे जुड़े *स्वस्ति* के भाव—अर्थात कल्याण, मंगल और शुभता—से प्रेरित यह यात्रा पूरे भारत में राष्ट्रीय एकता और साझा अपनत्व की भावना को सुदृढ़ करने का उद्देश्य रखती है।

झाँसी में आयोजित रामकथा यात्रा के प्रथम चरण का हिस्सा थी। इस चरण का शुभारंभ 10 अक्टूबर को कन्याकुमारी से हुआ था और इसका समापन 23 अक्टूबर, 2026 को केदारनाथ में निर्धारित है।

लगभग 9,000 किलोमीटर की भारत स्वस्तिक यात्रा में करीब 900 श्रद्धालु पूज्य मोरारी बापू के साथ दो विशेष ट्रेनों—कैलाश भारत गौरव ट्रेन और चित्रकूट भारत गौरव ट्रेन—में यात्रा कर रहे हैं। इन ट्रेनों में क्रमशः 22 और 16 कोच हैं।

पूज्य मोरारी बापू की रामकथा सत्य, प्रेम और करुणा के मूल्यों पर आधारित है। उनके लिए यह यात्रा इन मूल्यों को देश के कोने-कोने तक पहुँचाने और लोगों को एक सूत्र में जोड़ने का अवसर है।

यात्रा के दौरान आयोजित रामकथा और उससे जुड़े कार्यक्रम सभी के लिए खुले हैं। बापू की समावेशिता और सेवा की परंपरा के अनुरूप, प्रत्येक पड़ाव पर *भंडारे* का आयोजन किया जाता है, जहाँ प्रतिदिन निःशुल्क शाकाहारी भोजन प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

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